“Land Jihad” new tactics by Muslim expansionists .

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O Hindus ! Selling land to Muslims may prove
dangerous!
It is tragic that Muslims lure Hindus with money and
Hindus fall easy prey to their conspiracy. Will a
Muslim ever sell land to a Hindu ? Since there is no
education on Dharma for the Hindus, religious pride is
not created in them, and thus they incur a sin in this
manner. To fight against Muslims, it is necessary that
Hindus become strong at the physical, psychological
and spiritual levels. This can be achieved only through
education on Dharma
Is it a Land Jihad?
– Buy a small plot in non muslim area with high price.
– Start a small Namaz room with an aspiration to build
a colossal Mosque for Almighty Allah.
– Built Mosques one after another in non Muslims
area,
– Increase the numbers in non-Muslim area.
– Object on processions and band & Hindu festivals in
front of Mosques.
– Protest on temple Arti, Bhajan, Loudspeakers,
Prasad Distribution, Even protest ‘Ram Nam Satya
Hain chants’ in the last journey of Hindus.
– Oppose the Construction of any other religious
structure.
Ultimately to force Hindus to be evicted from their own
land?
~SriRamChannel

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गोस्वामी तुलसीदास

धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य क्या
मानस हमको सिखलाये । गोस्वामीजी पावन राह दिखाए ।।
परहित, दया, सत्य, अहिंसा
को धर्म-पुण्य बतलाये । गोस्वामीजी पावन ।।
परपीड़ा, निंदा, झूठ, हिंसा ही
अधर्म-पाप समझाये । गोस्वामीजी पावन ।।
बड़ों को मान जन-जन से प्रेम
सत्कर्म का पाठ पढाये । गोस्वामीजी पावन ।।
प्रजा-हित व जन्म-भूमि से
प्रेम की ज्योति जलाये । गोस्वामीजी पावन ।।
राम राज्य का सुंदर सपना
कितना हमें लुभाए । गोस्वामीजी पावन ।।
भारतीय-संस्कृत को मानस से
जीवटता मिल जाये । गोस्वामीजी पावन ।।
देश समाज के दुःख मिटे जाये
जो उस राह पे जाएँ । गोस्वामीजी पावन ।।
ज्ञान-विराग, भक्ति त्रिवेणी
सुजनों को नहलाये । गोस्वामीजी पावन ।।
भवसागर से पार जो होना
सीधा मार्ग बताये । गोस्वामीजी पावन ।।
जग में रहकर श्रीराम भजो
जन-जन को समुझाए । गोस्वामीजी पावन ।।
संतोष सुभ उपदेश मनोहर
मन अतिसय ललचाये । गोस्वामीजी पावन ।।

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http://bhagwa.weebly.com

Shree Ganeshay Namh

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं
कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं
नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं
दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणम्
कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥४॥

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं
अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥

महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं
प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥६॥

—–ऊँ———ऊँ——–ऊँ—–

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